अघोर मंत्र का अर्थ है हर वस्तु में शिव को देखना। 'ॐ अघोरेभ्यो...' मंत्र के जप से द्वैत भाव, मृत्यु का भय और पाप भस्म होते हैं तथा साधक को गहरा वैराग्य और आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
'अघोर' का अर्थ है जो घोर (भयानक) न हो, अर्थात जो सरल और सहज हो। भगवान शिव के पांच मुखों में से दक्षिण मुख को 'अघोर' कहा जाता है।
अघोर साधना का मूल उद्देश्य द्वैत भाव (अच्छा-बुरा, पवित्र-अपवित्र) को समाप्त कर हर वस्तु में केवल शिव (परमात्मा) को देखना है।