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अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ क्या है?
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संक्षिप्त उत्तर
अहं ब्रह्मास्मि = 'मैं ब्रह्म हूँ।' बृहदारण्यक उपनिषद (1.4.10)। यह अहंकार नहीं, आत्मज्ञान का उद्घोष है — शुद्ध चैतन्य (शरीर-मन से परे) ही ब्रह्म है। लहर = समुद्र, कंगन = सोना। इस अनुभव को प्राप्त करना
'अहं ब्रह्मास्मि' (अहम् + ब्रह्म + अस्मि) चार महावाक्यों में से एक है और यह आत्मज्ञान का उद्घोष है।
शाब्दिक अर्थ: - अहम् = मैं - ब्रह्म = परम सत्ता, सर्वव्यापक चेतना - अस्मि = हूँ - पूर्ण अर्थ: 'मैं ब्रह्म हूँ।
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