बीज मंत्र मनुष्य की रचना नहीं बल्कि साक्षात् देव-शक्तियों के ध्वन्यात्मक स्वरूप हैं — ऋषियों ने गहन योग-शक्ति से दैवीय शक्तियों की विशिष्ट ध्वनि-तरंगों को सुना और अनुभव किया। ये सृष्टि के आरंभ से विद्
हमारे ऋषि-मुनि 'मंत्र-कर्ता' नहीं, अपितु 'मंत्र-द्रष्टा' थे।
उन्होंने अपनी योग-शक्ति से उस ब्रह्मांडीय नाद-सागर में डुबकी लगाई और सृष्टि के मूल में स्थित विभिन्न दैवीय शक्तियों की विशिष्ट ध्वनि-तरंगों को सुना और अनुभव किया।