भगवान को नहीं, भक्त को आवश्यकता। कृतज्ञता — 'आपका दिया, पहले आप।' गीता 3.13 — अर्पित भोजन पाप मुक्त। भोजन→प्रसाद (दैवी ऊर्जा)। अहंकार तोड़ता, संयम सिखाता।
बिल्कुल सही प्रश्न है — भगवान को भूख नहीं लगती, फिर भी भोग लगाने का गहरा अर्थ है। भोग भगवान के लिए नहीं, भक्त के लिए है।
जब आप भोजन पहले भगवान को अर्पित करते हैं तो यह कृतज्ञता का भाव है — 'यह अन्न आपका दिया है, पहले आप ग्रहण करें।