हिंदू धर्म में भगवान निराकार भी हैं और साकार भी — दोनों सत्य, दोनों मान्य। उपनिषद = निराकार ब्रह्म; पुराण/गीता = साकार अवतार। तुलसीदास — 'सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा'। जैसे जल = निराकार, बर्फ = साकार
हिंदू धर्म की विशेषता यह है कि वह ईश्वर को निराकार और साकार दोनों मानता है।
यह 'और/या' (either/or) नहीं बल्कि 'दोनों' (both/and) का दर्शन है।