भोजन शुद्धि का मुख्य मंत्र है — 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्' (गीता 4.24), जिसका अर्थ है कि भोजन और भोजन-क्रिया सब ब्रह्म-स्वरूप हैं। इसके साथ 'ॐ सह नाववतु...' शांति मंत्र भी पढ
सनातन परम्परा में भोजन को ब्रह्म का स्वरूप माना गया है और उसे ग्रहण करने से पूर्व मंत्र पाठ से उसे शुद्ध और पवित्र करने की परम्परा है।
भोजन मंत्र के माध्यम से अन्न को ईश्वर को समर्पित करके फिर प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है।