इसका अर्थ शरीर को नश्वर मानने के बजाय उसे देवता का जाग्रत और दिव्य मंदिर समझना है।
कवच का गूढ़ लक्ष्य केवल रक्षा पाना नहीं है, बल्कि अपने 'देह-भाव' (यह नश्वर शरीर 'मैं' हूँ) को 'देव-भाव' (यह शरीर स्वयं देवता का जाग्रत मन्दिर है) में रूपान्तरण करना है।
कवच-पाठ से साधक अपने शरीर को एक दिव्य दुर्ग में बदल देता है जहाँ देवता रक्षक बनकर विराजते हैं।