कुंडली के 9वें भाव (धर्म/भाग्य) और 10वें भाव (कर्म/करियर) के स्वामियों के शुभ मिलन से बनने वाले सबसे शक्तिशाली योग को धर्म-कर्माधिपति योग कहते हैं।
वैदिक ज्योतिष में जन्म कुण्डली के नवम भाव (धर्म भाव) और दशम भाव (कर्म भाव) के अधिपतियों (स्वामियों) के मध्य जब एक शुभ और शास्त्रीय संबंध स्थापित होता है, तो उस विलक्षण ग्रहीय अवस्था को 'धर्म-कर्माधिपत
यह वैदिक ज्योतिष का सर्वोच्च और सर्वाधिक फलदायी राजयोग माना गया है।