'दीक्षा' = 'दा' (देना) + 'क्षि' (क्षय करना) — गुरु शिष्य को दिव्य दृष्टि और ज्ञान देते हैं और संचित कर्मों, पापों और अज्ञान का क्षय करते हैं। यह शब्द-कथन नहीं, चेतन ऊर्जा का हस्तांतरण (शक्तिपात) है।
'दीक्षा' शब्द की व्युत्पत्ति दो धातुओं से हुई है — 'दा' (देना) और 'क्षि' (क्षय करना या नष्ट करना)।
इस प्रकार, दीक्षा वह प्रक्रिया है जिसमें गुरु शिष्य को दिव्य दृष्टि एवं ज्ञान प्रदान करते हैं और उसके संचित कर्मों, पापों और अज्ञान का क्षय करते हैं।