क्योंकि यह 'लक्ष्मी स्थान' (भाग्य) और 'विष्णु स्थान' (कर्म) का मिलन है। इसमें इंसान का भाग्य उसके कर्म का पूरा साथ देता है, जिससे वह अपार सफलता पाता है।
शास्त्रीय दृष्टिकोण से, नवम भाव को 'लक्ष्मी स्थान' (भाग्य और ईश्वरीय कृपा) और दशम भाव को 'विष्णु स्थान' (कर्म और राज्य सत्ता) माना जाता है।
जब लक्ष्मी (नवम) और विष्णु (दशम) स्वरूप इन दोनों भावों के स्वामी परस्पर जुड़ते हैं, तो यह मिलन एक अत्यंत शक्तिशाली राजयोग बनाता है जो जातक को अपार सफलता, प्रतिष्ठा और भौतिक समृद्धि देता है।