कुंडलिनी मूलाधार में सोई हुई ब्रह्मांडीय ऊर्जा है। बीज मंत्र वे शक्तिशाली ध्वनियां हैं जो इस ऊर्जा पर चोट कर उसे जाग्रत करती हैं और सहस्रार तक ले जाती हैं।
कुंडलिनी शक्ति मानव शरीर में रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले सिरे (मूलाधार चक्र) पर साढ़े तीन लपेटे मारकर सोई हुई एक परम ब्रह्मांडीय ऊर्जा (सर्पिणी) है।
जब यह जाग्रत होती है, तो यह सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ऊपर उठकर सहस्रार चक्र में शिव से मिलन करती है।