कर्म योग से मोक्ष कैसे प्राप्त होता है गीता अनुसार
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कर्म योग: गीता 2.47 — कर्म करो, फल की चिंता छोड़ो। कर्म ईश्वर को अर्पित (9.27), सुख-दुख में समान (2.48), स्वधर्म पालन (3.35)। निष्काम कर्म → चित्त शुद्धि → ज्ञान → मोक्ष। कमल पत्र जैसे — कर्म करो पर लिप्त मत हो (5.10)।
- 1निष्काम कर्म — फल की इच्छा/आसक्ति के बिना कर्तव्य कर्म करो। कर्म करो, फल ईश्वर पर छोड़ो।
- 2ईश्वरार्पण बुद्धि — सभी कर्म ईश्वर को अर्पित करो। गीता 9.27 — 'यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।' — जो कुछ करो, खाओ, हवन करो, दान दो, तप करो — सब मुझे अर्पित करो।
- 3समत्व बुद्धि — सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहो। गीता 2.48 — 'योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।'
- 4कर्म-अकर्म-विकर्म (गीता 4.17-18) — कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म जो देखे, वही बुद्धिमान है। अर्थात कर्म करते हुए भी आसक्तिरहित रहना — यही वास्तविक कर्म योग है।
- 5स्वधर्म (गीता 3.35) — अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन करो, भले ही वह कठिन हो। दूसरे का धर्म अपनाने से अपना धर्म श्रेष्ठ है।
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