तंत्र में गुरु सेवा का क्या महत्व है?
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गुरु गीता: 'गुरुसेवा = सबसे बड़ा तप।' कृपा प्राप्ति (सेवा→कृपा→सिद्धि), अहंकार नाश, ज्ञान (सान्निध्य), कर्म शुद्धि, शक्ति संचार। सेवा: शारीरिक (आश्रम), वाचिक (प्रचार), मानसिक (आज्ञा), आर्थिक (दान)। एकलव्य, हनुमान = आदर्श।
- 1कृपा प्राप्ति: गुरु प्रसन्न = कृपा → शक्तिपात → मंत्र सिद्धि → मोक्ष। सेवा = कृपा का सबसे सरल मार्ग।
- 2अहंकार नाश: सेवा = 'मैं' भाव समाप्त → विनम्रता → आध्यात्मिक उन्नति।
- 3ज्ञान प्राप्ति: सेवा करते-करते गुरु का सान्निध्य → ज्ञान स्वतः।
- 4कर्म शुद्धि: निःस्वार्थ सेवा = कर्म बंधन कटते हैं।
- 5शक्ति संचार: गुरु सान्निध्य = शक्ति = Osmosis (स्वतः संचार)।
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तंत्र शास्त्र
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