वासांसि जीर्णानि श्लोक का अर्थ क्या है
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गीता 2.22 — जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र बदलकर नए पहनता है, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया धारण करती है। तात्पर्य: मृत्यु = वस्त्र बदलना; शरीर नाशवान, आत्मा शाश्वत। मृत्यु का भय अज्ञानता है।
- 1मृत्यु = वस्त्र बदलना: मृत्यु भय का विषय नहीं — यह केवल शरीर रूपी वस्त्र का परिवर्तन है। आत्मा (पहनने वाला) अपरिवर्तित है।
- 2शरीर नाशवान, आत्मा शाश्वत: वस्त्र फटते हैं, गंदे होते हैं, पुराने पड़ते हैं — शरीर भी वैसे ही। परंतु पहनने वाला (आत्मा) वही रहता है।
- 3संदर्भ: यह श्लोक कृष्ण ने अर्जुन को तब कहा जब अर्जुन अपने बंधुओं की मृत्यु के भय से युद्ध से विरत हो रहा था। कृष्ण समझा रहे हैं कि शरीर नष्ट होता है, आत्मा नहीं — अतः शोक अज्ञानता है।
- 4पुनर्जन्म का प्रमाण: यह श्लोक स्पष्ट रूप से पुनर्जन्म (शरीर बदलना) को स्थापित करता है।
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