कवचश्लोक 1–56
अथ देव्याः कवचम्
विनियोग
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
मूल पाठ (संस्कृत)
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १॥
ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥ २॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥ ३॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥ ४॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥ ५॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥ ६॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥ ७॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥ ८॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥ ९॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥ १०॥
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥ ११॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥ १२॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥ १३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥ १४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥ १५॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥ १६॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥ १७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥ १८॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥ १९॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥ २०॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥ २१॥
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥ २२॥
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥ २३॥
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥ २४॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥ २५॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥ २६॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥ २७॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥ २८॥
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥ २९॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥ ३०॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥ ३१॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥ ३२॥
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥ ३३॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥ ३४॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥ ३५॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥ ३६॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥ ३७॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥ ३८॥
आयु रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥ ३९॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥ ४०॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥ ४१॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥ ४२॥
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥ ४३॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥ ४४॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥ ४५॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥ ४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥ ४७॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥ ४८॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥ ४९॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥ ५०॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥ ५१॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥ ५२॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥ ५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥ ५४॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥ ५५॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ ॐ॥ ५६॥
इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।
हिन्दी अर्थ
ॐ चण्डिका देवीको नमस्कार है। मार्कण्डेयजीने कहा-पितामह! जो इस संसारमें परम गोपनीय तथा मनुष्योंकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला है और जो अबतक आपने दूसरे किसीके सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये॥ १॥ ब्रह्माजी बोले-ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवीका कवच ही है, जो गोपनीयसे भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका उपकार करनेवाला है। महामुने! उसे श्रवण करो॥ २॥ देवीकी नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। उनके नाम हैं-शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। ये नाम वेदभगवान् द्वारा प्रतिपादित हैं॥ ३-५॥ जो मनुष्य अग्निमें जल रहा हो, रणभूमिमें शत्रुओंसे घिर गया हो, विषम संकटमें फँस गया हो और भयसे आतुर होकर भगवती दुर्गाकी शरणमें गया हो, उसका कोई अमंगल नहीं होता। युद्ध-संकटमें भी उसके ऊपर विपत्ति नहीं आती और उसे शोक, दुःख तथा भयकी प्राप्ति नहीं होती॥ ६-७॥ जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवीका स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम निःसन्देह रक्षा करती हो॥ ८॥ चामुण्डा प्रेतपर, वाराही भैंसेपर, ऐन्द्री ऐरावत हाथीपर और वैष्णवी गरुड़पर आरूढ़ होती हैं॥ ९॥ माहेश्वरी वृषभपर, कौमारी मयूरपर और लक्ष्मी कमलासनपर विराजमान हैं तथा हाथोंमें कमल धारण करती हैं॥ १०॥ ईश्वरी श्वेतरूप धारण कर वृषभपर आरूढ़ हैं और ब्राह्मी हंसपर बैठी हुई सब आभूषणोंसे विभूषित हैं॥ ११॥ ये सभी माताएँ योगशक्तियोंसे सम्पन्न, आभूषणोंसे शोभायमान और रत्नोंसे सुशोभित हैं॥ १२॥ ये देवियाँ भक्तोंकी रक्षाके लिये रथपर आरूढ़ होकर शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल, मुसल, खेटक, तोमर, परशु, पाश, कुन्त, त्रिशूल और शार्ङ्ग धनुष आदि धारण करती हैं। दैत्योंका नाश, भक्तोंको अभयदान और देवताओंका कल्याण ही इनके शस्त्र-धारणका उद्देश्य है॥ १३-१५॥ महान् रौद्ररूप, घोर पराक्रम, महान् बल और उत्साहवाली, भयका नाश करनेवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। दुष्प्रेक्ष्ये, शत्रुओंका भय बढ़ानेवाली देवि! मेरी रक्षा करो॥ १६-१७॥ पूर्वमें ऐन्द्री, अग्निकोणमें अग्निशक्ति, दक्षिणमें वाराही, नैऋत्यमें खड्गधारिणी, पश्चिममें वारुणी और वायव्यमें मृगवाहिनी मेरी रक्षा करें॥ १७-१८॥ उत्तरमें कौमारी, ईशानमें शूलधारिणी, ऊपर ब्रह्माणी और नीचे वैष्णवी रक्षा करें। शववाहना चामुण्डा दसों दिशाओंमें रक्षा करें॥ १९-२०॥ जया आगेसे, विजया पीछेसे, अजिता बाएँसे, अपराजिता दाएँसे, उद्योतिनी शिखाकी और उमा मस्तककी रक्षा करें॥ २०-२१॥ मालाधरी ललाटकी, यशस्विनी भौंहोंकी, त्रिनेत्रा भ्रूमध्यकी और यमघण्टा नासिकाकी रक्षा करें॥ २२॥ शंखिनी नेत्रोंके मध्यभागकी, द्वारवासिनी कानोंकी, कालिका कपोलोंकी और शांकरी कानोंके मूलभागकी रक्षा करें॥ २३॥ सुगन्धा नासिका, चर्चिका ऊपरी ओष्ठ, अमृतकला निचले ओष्ठ और सरस्वती जिह्वाकी रक्षा करें॥ २४॥ कौमारी दाँतोंकी, चण्डिका कण्ठप्रदेशकी, चित्रघण्टा गलेकी घाँटीकी और महामाया तालुकी रक्षा करें॥ २५॥ कामाक्षी ठोड़ीकी, सर्वमंगला वाणीकी, भद्रकाली ग्रीवाकी और धनुर्धरी पृष्ठवंशकी रक्षा करें॥ २६॥ नीलग्रीवा कण्ठके बाहरी भागकी, नलकूबरी कण्ठनलीकी, खड्गिनी कंधोंकी और वज्रधारिणी भुजाओंकी रक्षा करें॥ २७॥ दण्डिनी हाथोंकी, अम्बिका अँगुलियोंकी, शूलेश्वरी नखोंकी और कुलेश्वरी कुक्षिकी रक्षा करें॥ २८॥ महादेवी स्तनोंकी, शोकविनाशिनी मनकी, ललिता हृदयकी और शूलधारिणी उदरकी रक्षा करें॥ २९॥ कामिनी नाभिकी, गुह्येश्वरी गुह्यभागकी, पूतना और कामिका मेढ्रकी तथा महिषवाहिनी गुदाकी रक्षा करें॥ ३०॥ भगवती कटिभागकी, विन्ध्यवासिनी घुटनोंकी और सर्वकामप्रदायिनी महाबला पिण्डलियोंकी रक्षा करें॥ ३१॥ नारसिंही गुल्फोंकी, तैजसी पादपृष्ठकी, श्री पादाङ्गुलियोंकी और तलवासिनी पैरोंके तलुओंकी रक्षा करें॥ ३२॥ दंष्ट्राकराली नखोंकी, ऊर्ध्वकेशिनी केशोंकी, कौबेरी रोमकूपोंकी और वागीश्वरी त्वचाकी रक्षा करें॥ ३३॥ पार्वती रक्त, मज्जा, वसा, मांस, अस्थि और मेदकी रक्षा करें। कालरात्रि आँतोंकी और मुकुटेश्वरी पित्तकी रक्षा करें॥ ३४॥ पद्मावती पद्मकोशोंमें, चूडामणि कफमें, ज्वालामुखी नखज्वालामें और अभेद्या सभी संधियोंमें रक्षा करें॥ ३५॥ ब्रह्माणी शुक्रकी, छत्रेश्वरी छायाकी और धर्मधारिणी अहंकार, मन तथा बुद्धिकी रक्षा करें॥ ३६॥ वज्रहस्ता प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायुकी रक्षा करें तथा कल्याणशोभना प्राणकी रक्षा करें॥ ३७॥ योगिनी रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्शकी रक्षा करें तथा नारायणी सत्त्व, रज और तमकी रक्षा करें॥ ३८॥ वाराही आयुकी, वैष्णवी धर्मकी और चक्रिणी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्याकी रक्षा करें॥ ३९॥ इन्द्राणी गोत्रकी, चण्डिका पशुओंकी, महालक्ष्मी पुत्रोंकी और भैरवी पत्नीकी रक्षा करें॥ ४०॥ सुपथा पथकी, क्षेमकरी मार्गकी, राजद्वारमें महालक्ष्मी और सर्वत्र स्थित विजया रक्षा करें॥ ४१॥ देवि! कवचमें जो स्थान छूट गया हो, वह सब भी जयन्ती पापनाशिनी तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो॥ ४२॥ जो अपने शुभकी इच्छा रखता है, वह कवचके बिना एक पग भी न चले। कवचसे आवृत मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है वहाँ अर्थलाभ, विजय और कामनासिद्धि पाता है; जो-जो कामना करता है, उसे प्राप्त करता है और अतुल ऐश्वर्यका भागी होता है॥ ४३-४४॥ कवचसे सुरक्षित मनुष्य निर्भय, संग्राममें अपराजित और त्रैलोक्यमें पूज्य होता है॥ ४५॥ यह देवीकवच देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। जो इसे नित्य, नियमपूर्वक, त्रिसंध्या श्रद्धासहित पढ़ता है, उसे दैवी कला प्राप्त होती है, वह त्रैलोक्यमें अपराजित रहता है और अपमृत्युसे रहित होकर सौसे अधिक वर्ष जीवित रहता है॥ ४६-४७॥ लूता, विस्फोटक आदि व्याधियाँ तथा स्थावर, जंगम और कृत्रिम विष नष्ट हो जाते हैं॥ ४८॥ भूतलके सभी अभिचार, मन्त्र-यन्त्र, भूचर, खेचर, जलज, उपदेशिक, सहज, कुलज, माला, डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्षचारी डाकिनियाँ, ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि हृदयमें स्थित कवचधारीको देखते ही नष्ट हो जाते हैं। कवच राजसम्मान और तेजकी वृद्धि करता है॥ ४९-५२॥ कवचपाठ करनेवाला पुरुष कीर्तिमण्डित भूतलपर यशके साथ बढ़ता है। जो पहले कवच पढ़कर सप्तशती चण्डीका पाठ करता है, उसकी पुत्र-पौत्रादि संतति पृथ्वी रहनेतक बनी रहती है॥ ५३-५४॥ देहान्तके बाद वह महामायाके प्रसादसे देवताओंके लिये भी दुर्लभ परम स्थान प्राप्त करता है और शिवके साथ आनन्दका भागी होता है॥ ५५-५६॥
प्रयोजन एवं फल
सर्वरक्षाकरं नृणाम्; श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे।