ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
रहस्यश्लोक 1–31

अथ प्राधानिकं रहस्यम्

विनियोग

ॐ अस्य श्रीसप्तशतीरहस्यत्रयस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप्छन्दः; महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता यथोक्तफलावाप्त्यर्थं जपे विनियोगः।

मूल पाठ (संस्कृत)
अथ प्राधानिकं रहस्यम् विनियोगः ॐ अस्य श्रीसप्तशतीरहस्यत्रयस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप्छन्दः; महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता यथोक्तफलावाप्त्यर्थं जपे विनियोगः। राजोवाच भगवन्नवतारा मे चण्डिकायास्त्वयोदिताः। एतेषां प्रकृतिं ब्रह्मन् प्रधानं वक्तुमर्हसि॥ १॥ आराध्यं यन्मया देव्याः स्वरूपं येन च द्विज। विधिना ब्रूहि सकलं यथावत्प्रणतस्य मे॥ २॥ ऋषिरुवाच इदं रहस्यं परममनाख्येयं प्रचक्षते। भक्तोऽसीति न मे किञ्चित्तवावाच्यं नराधिप॥ ३॥ सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी। लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता॥ ४॥ मातुलुङ्गं गदां खेटं पानपात्रं च बिभ्रती। नागं लिङ्गं च योनिं च बिभ्रती नृप मूर्धनि॥ ५॥ तप्तकाञ्चनवर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा। शून्यं तदखिलं स्वेन पूरयामास तेजसा॥ ६॥ शून्यं तदखिलं लोकं विलोक्य परमेश्वरी। बभार परमं रूपं तमसा केवलेन हि॥ ७॥ सा भिन्नाञ्जनसंकाशा दंष्ट्राङ्कितवरानना। विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा॥ ८॥ खड्गपात्रशिरःखेटैरलङ्कृतचतुर्भुजा। कबन्धहारं शिरसा बिभ्राणा हि शिरःस्रजम्॥ ९॥ सा प्रोवाच महालक्ष्मीं तामसी प्रमदोत्तमा। नाम कर्म च मे मातर्देहि तुभ्यं नमो नमः॥ १०॥ तां प्रोवाच महालक्ष्मीस्तामसीं प्रमदोत्तमाम्। ददामि तव नामानि यानि कर्माणि तानि ते॥ ११॥ महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा। निद्रा तृष्णा चैकवीरा कालरात्रिर्दुरत्यया॥ १२॥ इमानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि कर्मभिः। एभिः कर्माणि ते ज्ञात्वा योऽधीते सोऽश्नुते सुखम्॥ १३॥ तामित्युक्त्वा महालक्ष्मीः स्वरूपमपरं नृप। सत्त्वाख्येनातिशुद्धेन गुणेनेन्दुप्रभं दधौ॥ १४॥ अक्षमालाङ्कुशधरा वीणापुस्तकधारिणी। सा बभूव वरा नारी नामान्यस्यै च सा ददौ॥ १५॥ महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती। आर्या ब्राह्मी कामधेनुर्वेदगर्भा च धीश्वरी॥ १६॥ अथोवाच महालक्ष्मीर्महाकालीं सरस्वतीम्। युवां जनयतां देव्यौ मिथुने स्वानुरूपतः॥ १७॥ इत्युक्त्वा ते महालक्ष्मीः ससर्ज मिथुनं स्वयम्। हिरण्यगर्भौ रुचिरौ स्त्रीपुंसौ कमलासनौ॥ १८॥ ब्रह्मन् विधे विरिञ्चेति धातरित्याह तं नरम्। श्रीः पद्मे कमले लक्ष्मीत्याह माता च तां स्त्रियम्॥ १९॥ महाकाली भारती च मिथुने सृजतः सह। एतयोरपि रूपाणि नामानि च वदामि ते॥ २०॥ नीलकण्ठं रक्तबाहुं श्वेताङ्गं चन्द्रशेखरम्। जनयामास पुरुषं महाकाली सितां स्त्रियम्॥ २१॥ स रुद्रः शंकरः स्थाणुः कपर्दी च त्रिलोचनः। त्रयी विद्या कामधेनुः सा स्त्री भाषाक्षरा स्वरा॥ २२॥ सरस्वती स्त्रियं गौरीं कृष्णं च पुरुषं नृप। जनयामास नामानि तयोरपि वदामि ते॥ २३॥ विष्णुः कृष्णो हृषीकेशो वासुदेवो जनार्दनः। उमा गौरी सती चण्डी सुन्दरी सुभगा शिवा॥ २४॥ एवं युवतयः सद्यः पुरुषत्वं प्रपेदिरे। चक्षुष्मन्तो नु पश्यन्ति नेतरेऽतद्विदो जनाः॥ २५॥ ब्रह्मणे प्रददौ पत्नी महालक्ष्मीर्नृप त्रयीम्। रुद्राय गौरीं वरदां वासुदेवाय च श्रियम्॥ २६॥ स्वया सह सम्भूय विरिञ्चोऽण्डमजीजनत्। बिभेद भगवान् रुद्रस्तद् गौर्या सह वीर्यवान्॥ २७॥ अण्डमध्ये प्रधानादि कार्यजातमभून्नृप। महाभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ २८॥ पुपोष पालयामास तल्लक्ष्म्या सह केशवः। संजहार जगत्सर्वं सह गौर्या महेश्वरः॥ २९॥ महालक्ष्मीर्महाराज सर्वसत्त्वमयीश्वरी। निराकारा च साकारा सैव नानाभिधानभृत्॥ ३०॥ नामान्तरैर्निरूप्यैषा नाम्ना नान्येन केनचित्। ॐ॥ ३१॥ इति प्राधानिक रहस्यं सम्पूर्णम्।
हिन्दी अर्थ
ॐ सप्तशतीके इन तीनों रहस्योंके नारायण ऋषि, अनुष्टुप् छन्द तथा महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती देवता हैं। शास्त्रोक्त फलकी प्राप्तिके लिये जपमें इनका विनियोग होता है। राजा बोले- भगवन्! आपने चण्डिकाके अवतारोंकी कथा मुझसे कही। ब्रह्मन्! अब इन अवतारोंकी प्रधान प्रकृतिका निरूपण कीजिये॥ १॥ द्विजश्रेष्ठ! मैं आपके चरणोंमें पड़ा हूँ। मुझे देवीके जिस स्वरूपकी और जिस विधिसे आराधना करनी है, वह सब यथार्थरूपसे बतलाइये॥ २॥ ऋषि कहते हैं- राजन्! यह रहस्य परम गोपनीय है। इसे किसीसे कहनेयोग्य नहीं बतलाया गया है; किंतु तुम मेरे भक्त हो, इसलिये तुमसे न कहनेयोग्य मेरे पास कुछ भी नहीं है॥ ३॥ त्रिगुणमयी परमेश्वरी महालक्ष्मी ही सबका आदि कारण हैं। वे ही दृश्य और अदृश्यरूपसे सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके स्थित हैं॥ ४॥ राजन्! वे अपनी चार भुजाओंमें मातुलुंग, गदा, खेट एवं पानपात्र और मस्तकपर नाग, लिंग तथा योनि-इन वस्तुओंको धारण करती हैं॥ ५॥ तपाये हुए सुवर्णके समान उनकी कान्ति है, तपाये हुए सुवर्णके ही उनके भूषण हैं। उन्होंने अपने तेजसे इस शून्य जगत्को परिपूर्ण किया है॥ ६॥ परमेश्वरी महालक्ष्मीने इस सम्पूर्ण जगत्को शून्य देखकर केवल तमोगुणरूप उपाधिके द्वारा एक अन्य उत्कृष्ट रूप धारण किया॥ ७॥ वह रूप एक नारीके रूपमें प्रकट हुआ, जिसके शरीरकी कान्ति निखरे हुए काजलकी भाँति काले रंगकी थी, उसका श्रेष्ठ मुख दाढ़ोंसे सुशोभित था। नेत्र बड़े-बड़े और कमर पतली थी॥ ८॥ उसकी चार भुजाएँ ढाल, तलवार, प्याले और कटे हुए मस्तकसे सुशोभित थीं। वह वक्षःस्थलपर कबन्ध तथा मस्तकपर मुण्डोंकी माला धारण किये हुए थी॥ ९॥ इस प्रकार प्रकट हुई स्त्रियोंमें श्रेष्ठ तामसीदेवीने महालक्ष्मीसे कहा- माताजी! आपको नमस्कार है। मुझे मेरा नाम और कर्म बताइये॥ १०॥ तब महालक्ष्मीने स्त्रियोंमें श्रेष्ठ उस तामसीदेवीसे कहा- मैं तुम्हें नाम प्रदान करती हूँ और तुम्हारे जो-जो कर्म हैं, उनको भी बतलाती हूँ॥ ११॥ महामाया, महाकाली, महामारी, क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि तथा दुरत्यया॥ १२॥ ये तुम्हारे नाम हैं, जो कर्मोंके द्वारा लोकमें चरितार्थ होंगे। इन नामोंके द्वारा तुम्हारे कर्मोंको जानकर जो उनका पाठ करता है, वह सुख भोगता है॥ १३॥ राजन्! महाकालीसे यों कहकर महालक्ष्मीने अत्यन्त शुद्ध सत्त्वगुणके द्वारा दूसरा रूप धारण किया, जो चन्द्रमाके समान गौरवर्ण था॥ १४॥ वह श्रेष्ठ नारी अपने हाथोंमें अक्षमाला, अंकुश, वीणा तथा पुस्तक धारण किये हुए थी। महालक्ष्मीने उसे भी नाम प्रदान किये॥ १५॥ महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती, आर्या, ब्राह्मी, कामधेनु, वेदगर्भा और धीश्वरी- ये तुम्हारे नाम होंगे॥ १६॥ तदनन्तर महालक्ष्मीने महाकाली और महासरस्वतीसे कहा- देवियो! तुम दोनों अपने-अपने गुणोंके योग्य स्त्री-पुरुषके जोड़े उत्पन्न करो॥ १७॥ उन दोनोंसे यों कहकर महालक्ष्मीने पहले स्वयं ही स्त्री-पुरुषका एक जोड़ा उत्पन्न किया। वे दोनों हिरण्यगर्भ, सुन्दर तथा कमलके आसनपर विराजमान थे। उनमेंसे एक स्त्री थी और दूसरा पुरुष॥ १८॥ तत्पश्चात् माता महालक्ष्मीने पुरुषको ब्रह्मन्, विधे, विरिंच तथा धातः इस प्रकार सम्बोधित किया और स्त्रीको श्री, पद्मा, कमला, लक्ष्मी इत्यादि नामोंसे पुकारा॥ १९॥ इसके बाद महाकाली और महासरस्वतीने भी एक-एक जोड़ा उत्पन्न किया। इनके भी रूप और नाम मैं तुम्हें बतलाता हूँ॥ २०॥ महाकालीने कण्ठमें नील चिह्नसे युक्त, लाल भुजा, श्वेत शरीर और मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले पुरुषको तथा गोरे रंगकी स्त्रीको जन्म दिया॥ २१॥ वह पुरुष रुद्र, शंकर, स्थाणु, कपर्दी और त्रिलोचनके नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा स्त्रीके त्रयी, विद्या, कामधेनु, भाषा, अक्षरा और स्वरा- ये नाम हुए॥ २२॥ राजन्! महासरस्वतीने गोरे रंगकी स्त्री और श्याम रंगके पुरुषको प्रकट किया। उन दोनोंके नाम भी मैं तुम्हें बतलाता हूँ॥ २३॥ उनमें पुरुषके नाम विष्णु, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव और जनार्दन हुए तथा स्त्री उमा, गौरी, सती, चण्डी, सुन्दरी, सुभगा और शिवा- इन नामोंसे प्रसिद्ध हुई॥ २४॥ इस प्रकार तीनों युवतियाँ ही तत्काल पुरुषरूपको प्राप्त हुईं। इस बातको ज्ञाननेत्रवाले लोग ही समझ सकते हैं। दूसरे अज्ञानीजन इस रहस्यको नहीं जान सकते॥ २५॥ राजन्! महालक्ष्मीने त्रयीविद्यारूपा सरस्वतीको ब्रह्माके लिये पत्नीरूपमें समर्पित किया, रुद्रको वरदायिनी गौरी तथा भगवान् वासुदेवको लक्ष्मी दे दी॥ २६॥ इस प्रकार सरस्वतीके साथ संयुक्त होकर ब्रह्माजीने ब्रह्माण्डको उत्पन्न किया और परम पराक्रमी भगवान् रुद्रने गौरीके साथ मिलकर उसका भेदन किया॥ २७॥ राजन्! उस ब्रह्माण्डमें प्रधान आदि कार्यसमूह- पंचमहाभूतात्मक समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत्की उत्पत्ति हुई॥ २८॥ फिर लक्ष्मीके साथ भगवान् विष्णुने उस जगत्का पालन-पोषण किया और प्रलयकालमें गौरीके साथ महेश्वरने उस सम्पूर्ण जगत्का संहार किया॥ २९॥ महाराज! महालक्ष्मी ही सर्वसत्त्वमयी तथा सब सत्त्वोंकी अधीश्वरी हैं। वे ही निराकार और साकाररूपमें रहकर नाना प्रकारके नाम धारण करती हैं॥ ३०॥ सगुणवाचक सत्य, ज्ञान, चित्, महामाया आदि नामान्तरोंसे इन महालक्ष्मीका निरूपण करना चाहिये। केवल एक नाम महालक्ष्मीमात्रसे अथवा अन्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणसे उनका वर्णन नहीं हो सकता॥ ३१॥
प्रयोजन एवं फल

यथोक्तफलावाप्त्यर्थं जपे।