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वेद

वैदिक मंत्रों के उच्चारण में स्वर का क्या महत्व है

वैदिक मंत्रों में तीन स्वर: उदात्त (ऊँचा), अनुदात्त (नीचा), स्वरित (मिश्रित)। गलत स्वर = गलत अर्थ + हानि। पाणिनीय शिक्षा: 'मन्त्रो हीनः स्वरतो... स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति' — इन्द्रशत्रु का प्रसिद्ध उदाहरण। गुरुमुखी शिक्षा अनिवार्य। शिक्षा वेदांग = वेद का मुख।

#वैदिक स्वर#उदात्त#अनुदात्त
मंत्र विधि

वेद मंत्रों के उच्चारण में स्वर का महत्व क्या है?

3 स्वर: उदात्त (↑), अनुदात्त (↓), स्वरित (↑↓)। 'इन्द्रशत्रुः' उदाहरण: स्वर भेद = अर्थ विपरीत। शिक्षा वेदांग: 'स्वरहीन मंत्र वज्र समान हानि।' गुरुकुल/गुरु से सीखना अनिवार्य। सामान्य भक्ति जप (नाम/चालीसा) में यह नियम लागू नहीं।

#वैदिक स्वर#उदात्त#अनुदात्त
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