धर्म और आचारश्रौत और स्मार्त में क्या अंतर है?वेदश्रवण और वेदविहित यज्ञ से श्रौत, तथा शास्त्रार्थ-स्मरण और वर्णाश्रम नियम पालन से स्मार्त कहा गया है।#श्रौत#स्मार्त#वेद
धर्म और आचारसच्चा आचार्य कौन कहलाता है?जो स्वयं आचरण करता है, सबको आचार में लगाता है और शास्त्रार्थ का परिशीलन करता है, वही आचार्य है।#सच्चा आचार्य#आचरण#शास्त्र अर्थ
धर्म और आचारधर्म से अभीष्ट फल कैसे मिलता है?आचार्य लोग जिस कर्म से अभीष्ट फल की प्राप्ति हो उसे धर्म और जिससे अनिष्ट मिले उसे अधर्म कहते हैं।#धर्म#अभीष्ट फल#अनिष्ट फल
धर्म और आचारधर्म और अधर्म का सही अर्थ क्या है?कुशल कर्म धर्म और अकुशल कर्म अधर्म है; जिससे अभीष्ट मिले वह धर्म और जिससे अनिष्ट मिले वह अधर्म है।#धर्म#अधर्म#कुशल कर्म
साधु और संतब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति साधु कैसे होते हैं?ब्रह्मचारी विद्यासाधना से, गृहस्थ विहित कर्म से, वानप्रस्थ वनतपस्या से और यति योग तथा यतिधर्म से साधु होता है।#ब्रह्मचारी#गृहस्थ#वानप्रस्थ
साधु और संतसाधु किसे कहा जाता है?जो अपने आश्रम के धर्म का साधन करता है, वह साधु कहा गया है।#साधु#ब्रह्मचारी#गृहस्थ
धर्म और आचारधर्मज्ञ कौन होता है?श्रुति-स्मृति में बताए गए वर्णाश्रम धर्म का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति धर्मज्ञ कहलाता है।#धर्मज्ञ#वर्णाश्रम धर्म#श्रुति
धर्म और आचारद्विजाति किसे कहा गया है?ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सामान्य और विशेष पदार्थों से सम्बन्धविशेष के कारण द्विजाति कहे गए हैं।#द्विजाति#ब्राह्मण#क्षत्रिय
साधु और संतजितेन्द्रिय व्यक्ति कैसा होता है?जो इन्द्रिय-विषयों या ऐश्वर्यों की अप्राप्ति पर क्रोध नहीं करता और प्राप्ति पर हर्षित नहीं होता, वह जितात्मा है।#जितेन्द्रिय#इन्द्रिय संयम#ऐश्वर्य
साधु और संतसंत किसे कहा गया है?सत् शब्द का अर्थ ब्रह्म है; जो अंत में ब्रह्म को प्राप्त करते हैं, वे संत कहलाते हैं।#संत#सत्#ब्रह्म
शिव प्रसन्नताशिव किन लोगों पर प्रसन्न होते हैं?शिव संत, जितेन्द्रिय, धर्मज्ञ, साधु, आचार्य, दयावान्, तपस्वी, वैराग्यपरायण, ज्ञानी, दानी और सत्यवादी लोगों पर प्रसन्न होते हैं।#शिव#महेश्वर#संत
मुक्ति और पाशुपत योगपाशुपत योग में मन स्थिर क्यों रखना चाहिए?शिव की महिमा अनंत है, इसलिए पाशुपत योग में निष्ठापूर्वक रहकर मन को सदा उसी में स्थिर रखना चाहिए।#पाशुपत योग#मन स्थिर#शिव महिमा
मुक्ति और पाशुपत योगपरमेश्वर की कृपा से क्या-क्या सुलभ होता है?परमेश्वर की कृपा से धर्म, ऐश्वर्य, ज्ञान, वैराग्य और मोक्ष सुलभ हो जाते हैं।#परमेश्वर कृपा#धर्म#ऐश्वर्य
मुक्ति और पाशुपत योगआत्मविद्या से अज्ञान कैसे नष्ट होता है?योगी आत्मविद्यारूप प्रदीप से अज्ञानान्धकार को नष्ट करके अपने भीतर साक्षात् ईश्वर का दर्शन करता है।#आत्मविद्या#अज्ञान नाश#ईश्वर दर्शन
योगी की शक्तियाँयोगी देवताओं, ग्रहों और भुवनों को कैसे देखता है?योगी देवताओं के बिम्ब, विमानों, ग्रहों, नक्षत्रों, तारों, भुवनों और पातालस्थ पदार्थों को समाधि से देख सकता है।#योगी#देव दर्शन#ग्रह
योगी की शक्तियाँयोगी ब्रह्मा से स्थावर तक संसार को कैसे देखता है?योगी के लिये ब्रह्मा से स्थावर तक समग्र संसार हस्तामलक के समान स्पष्ट हो जाता है।#योगी#ब्रह्मा से स्थावर#हस्तामलक
योगी की शक्तियाँयोगी को पशु-पक्षियों की ध्वनि कैसे समझ आती है?योगी में सिद्धियों और सतत अभ्यास से ऐसे विज्ञान उत्पन्न होते हैं कि उसे पशु और पक्षियों की ध्वनियों का ज्ञान हो जाता है।#योगी#पशु ध्वनि#पक्षी ध्वनि
योगी की शक्तियाँसिद्धियाँ न छोड़ने वाला योगी क्या कर सकता है?जो योगी लोककल्याण या लीला के लिए सिद्धियाँ नहीं छोड़ता, वह आकाश में क्रीड़ा, वेदार्थ वचन, काव्यरचना और पशु-पक्षी ध्वनि का ज्ञान कर सकता है।#योगी#सिद्धियाँ#लीला
शैव पद और वैराग्यपरम वैराग्य से कैसी मुक्ति मिलती है?परम वैराग्य से शिव प्रसन्न होने पर साधक को विमल मुक्ति प्राप्त होती है।#परम वैराग्य#विमल मुक्ति#महेश्वर
शैव पद और वैराग्यसिद्धियों का त्याग करने से महेश्वर कैसे प्रसन्न होते हैं?चित्त को विषयभोगों से हटाकर विघ्नरूप ब्राह्म ऐश्वर्यों का त्याग करने से महेश्वर प्रसन्न होते हैं।#सिद्धि त्याग#महेश्वर प्रसन्न#वैराग्य
शैव पद और वैराग्यगुणवैतृष्ण्य क्या है?पुरुष में वितृष्णा नाम से प्रसिद्ध भाव को गुणवैतृष्ण्य कहा गया है।#गुणवैतृष्ण्य#वितृष्णा#वैराग्य
शैव पद और वैराग्यविषय भोगों को नश्वर क्यों समझना चाहिए?विषयभोग भय उत्पन्न करने वाले और अवश्य नाशवान हैं, इसलिए उनका अश्रद्धा से त्याग करना चाहिए।#विषय भोग#नश्वरता#वैराग्य
शैव पद और वैराग्यवैराग्य से सिद्धियों का त्याग कैसे किया जाता है?सिद्धियों को समाधि में विघ्न मानकर परम वैराग्य से रोकना और विषयभोगों की नश्वरता जानकर त्यागना चाहिए।#वैराग्य#सिद्धि त्याग#औपसर्गिक सिद्धि
शैव पद और वैराग्यसिद्धियाँ समाधि में विघ्न क्यों बनती हैं?चौंसठ गुण व्यवहार में सिद्धि कहे जाते हैं, पर समाधि में वही उपसर्ग यानी विघ्न बन जाते हैं।#सिद्धि#समाधि#उपसर्ग
शैव पद और वैराग्यशैव पद वैष्णव पद से परे क्यों कहा गया है?शैव पद वैष्णव पद से परे बताया गया है; उसे विष्णु भी नहीं जानते और शुद्ध शिवात्मक तत्त्व असंख्य गुणों वाला कहा गया है।#शैव पद#वैष्णव पद#शिवात्मक तत्त्व
शैव पद और वैराग्यवैष्णव पद क्या बताया गया है?ब्राह्म ऐश्वर्य के तत्त्वों को प्रधानसम्बन्धी वैष्णव पद बताया गया है।#वैष्णव पद#ब्राह्म ऐश्वर्य#प्रधान
औपसर्गिक ऐश्वर्यब्राह्म ऐश्वर्य क्या है?बिना कारण जगत् की सृष्टि, अनुग्रह, प्रलय, अधिकार, लोकवृत्त प्रवर्तन और संसार का कर्तृत्व ब्राह्म ऐश्वर्य है।#ब्राह्म ऐश्वर्य#सृष्टि#अनुग्रह
औपसर्गिक ऐश्वर्यप्रजापति संबंधी ऐश्वर्य क्या हैं?छेदन, ताडन, बन्ध, संसार परिवर्तन, सर्वभूतप्रसाद, मृत्यु और काल पर जय प्रजापति संबंधी आहंकारिक ऐश्वर्य हैं।#प्रजापति ऐश्वर्य#आहंकारिक ऐश्वर्य#छेदन
औपसर्गिक ऐश्वर्यमानस गुण क्या हैं?इच्छित वस्तु की प्राप्ति, जहाँ चाहें जाना, गुप्त पदार्थ देखना, इच्छानुसार रूप धारण करना और जगत देखना मानस गुण हैं।#मानस गुण#इच्छित वस्तु#रूप धारण
औपसर्गिक ऐश्वर्यआकाश संबंधी ऐश्वर्य क्या है?छाया न होना, आकाशगमन, दूरश्रवण, सभी शब्दों का ज्ञान, तन्मात्रा ज्ञान और सभी प्राणियों को देखना आकाश संबंधी ऐश्वर्य है।#आकाश ऐश्वर्य#ऐन्द्र ऐश्वर्य#आकाश गमन
औपसर्गिक ऐश्वर्यवायु संबंधी ऐश्वर्य क्या है?मन की गति पाना, दूसरों के अन्तर्मन में निवास, हल्का-भारी होना, वायु पकड़ना और आकाश तत्त्व से देह धारण करना वायु ऐश्वर्य है।#वायु ऐश्वर्य#मन की गति#हल्का भारी
औपसर्गिक ऐश्वर्यतैजस ऐश्वर्य क्या है?देह से अग्नि बनाना, अग्नि से निर्भय रहना, जल में अग्नि रखना, हाथ से आग पकड़ना और भस्म वस्तु को पूर्ववत करना तैजस ऐश्वर्य में आता है।#तैजस ऐश्वर्य#अग्नि#आग पकड़ना
औपसर्गिक ऐश्वर्यजल संबंधी ऐश्वर्य क्या है?जल में निवास, जल से बाहर आने की शक्ति, समुद्र पान, जल दर्शन, रसयुक्त भक्षण और जलपिण्ड धारण जैसे गुण जल संबंधी ऐश्वर्य हैं।#जल ऐश्वर्य#आप्य ऐश्वर्य#समुद्र पान
औपसर्गिक ऐश्वर्यपार्थिव ऐश्वर्य क्या है?शरीर की स्थूलता, ह्रस्वता, बालकपन, वृद्धता, यौवन, अनेक रूप, विशेष देहधारण और सुगन्ध ये पार्थिव गुण बताए गए हैं।#पार्थिव ऐश्वर्य#शरीर परिवर्तन#स्थूलता
औपसर्गिक ऐश्वर्ययोग में आने वाले चौंसठ गुण क्या हैं?आठ गुण वृद्धि क्रम से बढ़कर चौंसठ गुण कहे गए हैं; ये पार्थिव, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, अहंकार और ब्राह्म ऐश्वर्य से जुड़े हैं।#चौंसठ गुण#औपसर्गिक गुण#पार्थिव
औपसर्गिक ऐश्वर्ययोगी अपने शरीर में ब्रह्मलोक तक कैसे देखता है?योगजनित धर्मरूप संसर्ग से योगी ब्रह्मलोक तक जो कुछ है, उसे अपने शरीर में स्थित देखता है।#योगी#ब्रह्मलोक#देह में जगत
उपसर्ग और सिद्धियाँअणिमा आदि सिद्धियाँ कब मिलती हैं?प्रतिभा आदि स्वल्प सिद्धियों के आकर्षण से मुक्त मुनि को अणिमा आदि सिद्धियाँ अभिलषित सिद्धि देती हैं।#अणिमा#सिद्धि#स्वल्प सिद्धि
उपसर्ग और सिद्धियाँछोटी सिद्धियों से बचना क्यों जरूरी है?प्रतिभा आदि छह स्वल्प सिद्धियाँ आकर्षक हैं, पर उनके आकर्षण से मुक्त मुनि को आगे अणिमादि सिद्धियाँ मिलती हैं।#स्वल्प सिद्धि#प्रतिभा#श्रवणा
उपसर्ग और सिद्धियाँवार्ता सिद्धि क्या है?बुद्धि से दिव्य गन्धों का गन्धतन्मात्रा रूप में यथार्थ अनुभव करना वार्ता सिद्धि है।#वार्ता सिद्धि#दिव्य गन्ध#गन्धतन्मात्रा
उपसर्ग और सिद्धियाँआस्वाद सिद्धि क्या है?दिव्य रसों का सहज और यथार्थ ज्ञान होना आस्वाद सिद्धि है।#आस्वाद सिद्धि#दिव्य रस#रस ज्ञान
उपसर्ग और सिद्धियाँदर्शना सिद्धि क्या है?बिना प्रयास दिव्य रूपों का नेत्रेन्द्रिय से दिखाई पड़ना दर्शना सिद्धि है।#दर्शना सिद्धि#दिव्य रूप#नेत्रेन्द्रिय
उपसर्ग और सिद्धियाँवेदना सिद्धि क्या है?स्पर्श की अनुभूति को वेदना सिद्धि कहा गया है।#वेदना सिद्धि#स्पर्श#अनुभूति
उपसर्ग और सिद्धियाँश्रवणा सिद्धि क्या है?बिना प्रयास सभी शब्द, स्वर और गुह्य ध्वनि सुनकर उनका यथार्थ ज्ञान होना श्रवणा सिद्धि है।#श्रवणा सिद्धि#शब्द ज्ञान#स्वर
उपसर्ग और सिद्धियाँप्रतिभा सिद्धि क्या है?भूत, भविष्य, सूक्ष्म, अदृष्ट, दूरस्थ और समीप पदार्थों का ज्ञान देने वाली वृत्ति प्रतिभा सिद्धि कही गई है।#प्रतिभा सिद्धि#भूत भविष्य ज्ञान#सूक्ष्म ज्ञान
उपसर्ग और सिद्धियाँयोग साधना में उपसर्ग क्या होते हैं?विघ्नों के हट जाने के बाद योगसाधना में जो नाना उपद्रव उत्पन्न होते हैं, वे उपसर्ग हैं और असिद्धिसूचक कहे गए हैं।#उपसर्ग#योग साधना#सिद्धियाँ
योग बाधाएँयोग की बाधाएं कैसे दूर होती हैं?अत्यन्त उत्साह से अभ्यास करने वाले साधक की योग बाधाएँ दूर हो जाती हैं।#योग बाधा#अभ्यास#उत्साह
योग बाधाएँविषयलोलता योग में बाधा क्यों है?योग्य-अयोग्य जानते हुए भी अयोग्य विषयों में हठपूर्वक आसक्ति रखना विषयलोलता है, इसलिए यह योग में बाधा है।#विषयलोलता#अयोग्य विषय#योग बाधा
योग बाधाएँदौर्मनस्य क्या है?तमोगुण और रजोगुण से मिले मन में उत्पन्न दूषित भाव दौर्मनस्य है; इसे परम वैराग्य से नियंत्रित करना चाहिए।#दौर्मनस्य#दुर्मन#तमोगुण
योग बाधाएँतीन प्रकार के दुःख कौन से हैं?तीन प्रकार के सहज दुःख आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक बताए गए हैं।#त्रिविध दुःख#आध्यात्मिक#आधिभौतिक