दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः (अगस्त्य रचित)
दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः स्फटिकमणिनिभैरक्षमालान्दधाना। हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण॥ भासा कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकमणिनिभा भासमानाऽसमाना। सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
जो चार भुजाओं से युक्त हैं, स्फटिक की माला, श्वेत कमल, तोता और पुस्तक धारण करती हैं, वे सुप्रसन्न वाग्देवता मेरे मुख में सदा निवास करें।
इस मंत्र से क्या होगा?
वदन (मुख) पर सदा वाग्देवी की प्रसन्नता का वास
विस्तृत लाभ
वदन (मुख) पर सदा वाग्देवी की प्रसन्नता का वास।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ 17
ॐ महाविष्णुर्-दक्षिणे तु महाज्वालस्तु नैरृतौ
एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम् । लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम् ॥
ॐ पारिजातापहारकाय नमः
ॐ कूर्चजपपरायणायै नमः
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं सर्व विघ्न निवारणाय महा क्रोध भैरवाय नमः।