शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
देवी सूक्त मंत्र - 5
अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः। यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारवैदिक मंत्र |
स्वरूपज्ञानदात्री
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
देवों और मनुष्यों द्वारा सेवनीय इस तत्त्व का मैं स्वयं उपदेश करती हूँ। मैं जिस पर प्रसन्न होती हूँ, उसे श्रेष्ठ बना देती हूँ—उसे ब्रह्मा, ऋषि या परम ज्ञानी बना देती हूँ 1।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
मेधा, बुद्धि, उच्च पद और ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति
विस्तृत लाभ
मेधा, बुद्धि, उच्च पद और ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति 1।
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