देवी सूक्त मंत्र - 3
अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
मैं सम्पूर्ण जगत की ईश्वरी, धन प्रदान करने वाली, परब्रह्म को जानने वाली और पूजनीयों में प्रथम हूँ। मुझे देवताओं ने अनेक रूपों में प्रतिष्ठित किया है 1।
इस मंत्र से क्या होगा?
नेतृत्व क्षमता, राष्ट्र-निर्माण और सर्वोच्च प्रतिष्ठा की प्राप्ति
विस्तृत लाभ
नेतृत्व क्षमता, राष्ट्र-निर्माण और सर्वोच्च प्रतिष्ठा की प्राप्ति 1।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥
शङ्खेषु चाप कुसुमेषु कुठार पाश चक्राङ्कुशौ कलममञ्जरिका गदाद्यौ । पाणिस्थितैः परिसमाहित भूषणः श्री विघ्नेश्वरो विजयते तपनीयगौरः ॥
ॐ शिवशिक्षापराय नमः
ॐ गोविंदां-पतये नमः
ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्म्यै स्वाहेति दन्तपङ्क्तीः सदाऽवतु। (स्वरूप: ब्राह्मी | लाभ: दाँतों और स्पष्ट वाचन-स्थान की रक्षा | अर्थ: ब्राह्मी देवी मेरी दंत-पंक्तियों की सदा रक्षा करें) 8
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। आयुरारोग्यमैश्वर्यं तस्य पुण्यफलप्रदम्॥