शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
विघ्ननाशक मूल श्लोक
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारस्तोत्र-मंत्र
स्वरूपवक्रतुण्ड
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
हे घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर वाले और करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले देव, मेरे सभी कार्यों को सदैव बाधारहित करें।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
सभी कार्यों में आने वाली बाधाओं का नाश और निर्विघ्न सफलता
विस्तृत लाभ
सभी कार्यों में आने वाली बाधाओं का नाश और निर्विघ्न सफलता।
जप काल
किसी भी कार्य, परीक्षा या यात्रा के आरंभ में।
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