सर्व-व्यापकता मंत्र
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते ॥ सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति ॥ सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ॥ सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ॥ त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ॥ त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
यह संपूर्ण जगत आपसे उत्पन्न होता है, आपमें ही स्थित है, और अंततः आपमें ही विलीन हो जाएगा। आप ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। आप ही वाणी के चार रूप हैं।
इस मंत्र से क्या होगा?
प्रकृति के पंचतत्त्वों और ईश्वर के मध्य सामंजस्य की अनुभूति
विस्तृत लाभ
प्रकृति के पंचतत्त्वों और ईश्वर के मध्य सामंजस्य की अनुभूति।
जप काल
योग साधना और पंचतत्त्व ध्यान के दौरान।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः। अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा॥
ॐ कर्पूरमालाभरणायै नमः
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने प्रणतक्लेशनाशाय
ॐ इन्दुशीतलायै नमः
ॐ श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै नमः
ॐ तत्सत् भूर्भुवः स्वः तस्मै परब्रह्मणे नमः (गोपाल-तापनी में विभिन्न वर्णनों के साथ प्रयुक्त)