शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
देवी सूक्त मंत्र - 3
अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारवैदिक मंत्र |
स्वरूपराजराजेश्वरी / वाक्
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
मैं सम्पूर्ण जगत की ईश्वरी, धन प्रदान करने वाली, परब्रह्म को जानने वाली और पूजनीयों में प्रथम हूँ। मुझे देवताओं ने अनेक रूपों में प्रतिष्ठित किया है 1।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
नेतृत्व क्षमता, राष्ट्र-निर्माण और सर्वोच्च प्रतिष्ठा की प्राप्ति
विस्तृत लाभ
नेतृत्व क्षमता, राष्ट्र-निर्माण और सर्वोच्च प्रतिष्ठा की प्राप्ति 1।
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