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शास्त्रीय पौराणिक मंत्र

सुब्रह्मण्य पंचरत्नम्

जाज्वल्यमानं सुरवृन्दवन्द्यं कुमारधारातटमन्दिरस्थम् । कन्दर्परूपं कमनीयगात्रं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये ॥

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारश्लोक 2
स्वरूपकमनीय कुमार
अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का अर्थ

जो अत्यंत तेजस्वी, देव-वंदित और कामदेव के समान कमनीय शरीर वाले हैं, मैं उनकी शरण में हूँ।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

तेज, आकर्षण और शारीरिक आरोग्यता

विस्तृत लाभ

तेज, आकर्षण और शारीरिक आरोग्यता।

जप काल

स्कंद षष्ठी पर जप।

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