श्रीकृष्ण मंत्र
इतीदमद्भुतस्तवं निशम्य भानुनन्दिनी करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्षभाजनम्। भवेत्तदैव सञ्चितत्रिरूपकर्मनाशनं लभेत्तदा व्रजेन्द्रसूनुमण्डलप्रवेशनम्॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
(फलश्रुति) हे भानुनन्दिनी! इस अद्भुत स्तुति को सुनकर आप अपने दास को सदा के लिए कृपा-कटाक्ष का पात्र बना लें, जिससे मेरे प्रारब्ध कर्म नष्ट हों और मैं कृष्ण के नित्य मण्डल में प्रवेश पाऊँ।
इस मंत्र से क्या होगा?
लाभ: संचित कर्मों का नाश और ब्रजमंडल में प्रवेश
विस्तृत लाभ
लाभ: संचित कर्मों का नाश और ब्रजमंडल में प्रवेश।
टिप्पणी
यहाँ इस सिद्ध स्तोत्र के सभी 19 श्लोकों को मंत्र रूप में, उनके अर्थ और लाभ सहित प्रस्तुत किया गया है। सभी का
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ कुमारब्रह्मचारिणे नमः
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥
ॐ ह्रीं क्लीं वाण्यै स्वाहेति मम पृष्ठं सदाऽवतु। (स्वरूप: वाणी | लाभ: पीठ और मेरुदंड की रक्षा | अर्थ: वाणी मेरी पीठ की सदा रक्षा करें) 8
ॐ भारद्वाजस्तुताय नमः
ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं क्रीं क्लीं श्रीं महालक्ष्मी मम गृहे धनं पूरय पूरय चिंतायै दूरय दूरय स्वाहा।
ॐ जगच्चक्राय स्वाहा – शिखायै वषट्