शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
श्रीकृष्ण मंत्र
ॐ तृणीकृततृणावर्ताय नमः
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारनाम-जप मन्त्र; ये मन्त्र वासुदेव, बाल-गोपाल, और द्वारकाधीश स्वरूपों का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं।
स्वरूपतृणावर्त-संहारक
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
तृणावर्त दैत्य को तिनके के समान नष्ट करने वाले को नमस्कार।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
वात-रोग एवं अंधड़ से रक्षा
विस्तृत लाभ
वात-रोग एवं अंधड़ से रक्षा
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प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥ 16
कांसोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
श्रीमत्तीक्ष्ण शिखाङ्कुशाक्षवरदान् दक्षे दधानः करैः पञ्चामृतपूर्णकुम्भमभयं वामे दधानो मुदा । पीठ स्वर्णमयारविन्दविलसत् सत्कर्णिका भासुरे आसीनस्त्रिमुखः पलाशरुचिरो नागाननः पातु नः ॥
ॐ त्रिकूटस्थायै नमः
ॐ चन्द्रवर्णाय नमः
जिन्होंने धर्म-विरोधी आतातायी क्षत्रियों पर विजय प्राप्त की, उन्हें नमस्कार। (लाभ: प्रतिस्पर्धियों पर विजय) 19।