शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
शृतं मे मा प्रहासीः
ॐ शृतं मे मा प्रहासीः अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधामि ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारउपनिषद शांति मन्त्र / विद्या ग्रहण मन्त्र
स्वरूपब्रह्मविद्या-स्वरूपिणी
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
मैंने जो सुना (पढ़ा) है, वह मेरा त्याग न करे (मुझे याद रहे)। इस अध्ययन से मैं दिन-रात को एक कर दूँ। मैं ऋत (शाश्वत सत्य) बोलूंगा, सत्य बोलूंगा। वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे, वह वक्ता (गुरु) की रक्षा करे।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
अध्ययन किए गए ज्ञान का विस्मरण न होना (याददाश्त पक्की होना), सत्यभाषण की अमोघ शक्ति
विस्तृत लाभ
अध्ययन किए गए ज्ञान का विस्मरण न होना (याददाश्त पक्की होना), सत्यभाषण की अमोघ शक्ति।
जप काल
वेदाध्ययन या किसी भी गंभीर पुस्तक के पठन से पूर्व।
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