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मैसूर दशहरा 2025: राजपरिवार ने स्वर्ण सिंहासन सजाया, निजी दरबार की तैयारी पूरी
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मैसूर दशहरा 2025: राजपरिवार ने स्वर्ण सिंहासन सजाया

📿 पौराणिक•3 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 19 सितंबर 2025
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280 किलो स्वर्ण और रत्नों से बने ऐतिहासिक सिंहासन को मंत्रोच्चारण और पूजा-अर्चना के बीच स्थापित किया गया; यदुवीर वाडियार ने परंपरा का निर्वाह किया

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मैसूर दशहरा की परंपरा: स्वर्ण सिंहासन की सज्जा

मैसूर दशहरा की परंपरा: स्वर्ण सिंहासन की सज्जा और निजी दरबार की तैयारी

दशहरा महोत्सव की आभा में मैसूर पैलेस एक बार फिर अपनी प्राचीन परंपरा का साक्षी बना। राजपरिवार के उत्तराधिकारी यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा वाडियार ने इस वर्ष भी स्वर्ण सिंहासन की विधिवत स्थापना की, जो दशहरा के दौरान होने वाले निजी दरबार की पहचान है। यह सिंहासन लगभग 280 किलोग्राम स्वर्ण और रत्नों से निर्मित है और मैसूर की सांस्कृतिक विरासत का अनमोल प्रतीक माना जाता है।

परंपरा का निर्वाह

Deccan Herald की रिपोर्ट के अनुसार, सिंहासन को पैलेस के strong room से सावधानीपूर्वक बाहर लाकर Durbar Hall और Kannadi Thotti (ग्लास पवेलियन) में स्थापित किया गया। पारंपरिक मंत्रोच्चारण और पूजापाठ के बीच इसे सजाया गया। यदुवीर वाडियार ने पुरोहितों के साथ मिलकर इस आयोजन में भाग लिया और परंपरा के अनुसार शामावंद अनुष्ठान सम्पन्न किया। यह प्रथा कोई आधुनिक आविष्कार नहीं, बल्कि सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा है। वाडियार वंश के शासकों ने दशहरा के अवसर पर सिंहासन पर विराजमान होकर देवी-देवताओं की पूजा की और राज्य की समृद्धि और धर्म की रक्षा का संकल्प दोहराया। आज भी यह निजी दरबार उसी ऐतिहासिक अनुशासन और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

स्वर्ण सिंहासन केवल सोने और रत्नों से बनी एक वस्तु नहीं है, बल्कि यह मैसूर की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। दशहरे के समय इस सिंहासन की स्थापना यह स्मरण कराती है कि सत्ता का असली अर्थ सेवा और धर्म की रक्षा है। स्थानीय मीडिया ने इसे “राजपरिवारिक उत्सव की आत्मा” कहा है। इस वर्ष आयोजन का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि कोरोना प्रतिबंधों के बाद पहली बार पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ निजी दरबार का आयोजन हो रहा है। स्थानीय लोग और पर्यटक दोनों इस क्षण के गवाह बने, जिसे देखकर उन्हें लगा कि वे इतिहास को अपनी आँखों से जीवंत होते देख रहे हैं।

सरकार और समाज की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री ने भी सोशल मीडिया पर सिंहासन की तस्वीर साझा करते हुए इस परंपरा को संजोने की आवश्यकता पर बल दिया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह आयोजन न केवल मैसूर की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखता है बल्कि स्थानीय पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देता है।

निष्कर्ष

मैसूर दशहरा का यह स्वर्ण सिंहासन केवल आभूषण नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक गौरव का अद्वितीय प्रतीक है। जब भी इसे स्थापित किया जाता है, तो वह दृश्य केवल राजपरिवार का उत्सव नहीं, बल्कि सम्पूर्ण कर्नाटक और भारत की सांस्कृतिक धरोहर का पुनरुद्धार प्रतीत होता है। इस वर्ष की यह सज्जा और पूजा-अर्चना हमें फिर याद दिलाती है कि परंपरा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को भी दिशा देने वाली शक्ति है।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

पर्व

दशहरा पर शस्त्र पूजा कैसे करें

दशहरा शस्त्र पूजा: शस्त्र/आयुध स्वच्छ करें → लाल कपड़े पर रखें → हल्दी-कुमकुम-अक्षत → पुष्प-धूप-दीप → 'ॐ शस्त्रेभ्यो नमः'। दक्षिण भारत: आयुध पूजा — पुस्तकें, वाद्य, वाहन, औजार। आधुनिक: कार्य उपकरणों की पूजा = कृतज्ञता।

पर्व

दशहरा पर शमी पूजा का क्या महत्व है

शमी पूजा (दशहरा): महाभारत — पाण्डवों ने शमी पर शस्त्र छिपाए, विजयदशमी पर उतारे। शमी पत्ते = 'सोना' — एक-दूसरे को भेंट। 'शमी शमयते पापम्' = पाप शमन। शमी में अग्नि का वास। शनि शान्ति। महाराष्ट्र/दक्षिण भारत में अत्यन्त प्रचलित।

पर्व

दशहरा पर शमी वृक्ष की पूजा का पौराणिक कारण क्या है

शमी पूजा कारण: महाभारत — पाण्डवों ने शमी पर शस्त्र छिपाए, विजयदशमी को उतारे → विजय। 'शमी शमयते पापम्' = पापनाशक। शमी पत्ते='सोना' भेंट। अग्नि निवास (अरणि)। शनि वृक्ष। महाराष्ट्र/दक्षिण में अत्यन्त प्रचलित।

पर्व

दशहरा पर रावण दहन का आध्यात्मिक अर्थ क्या है

रावण दहन = अपने भीतर की 10 बुराइयों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य आदि) का दहन। अध्यात्म: राम = आत्मा, रावण = अहंकार, सीता = बुद्धि — अहंकार पर आत्मा की विजय। 9 दिन शक्ति साधना → 10वें दिन विजय। बाहरी दहन प्रतीकात्मक — वास्तविक विजय आन्तरिक।

त्योहार पूजा

दशहरा पर नीलकंठ पक्षी के दर्शन शुभ क्यों माने जाते हैं?

दशहरा नीलकंठ: शिव दूत (विजय संकेत), राम-रावण विजय स्मृति, शमी+नीलकंठ=अत्यंत शुभ, धन+विजय। शकुन शास्त्र: सर्वदा शुभ, दशहरा=सर्वाधिक। दाहिनी ओर=तुरंत सफलता। न दिखे=शमी पूजा+शिव जप।

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