खण्ड 1: पारदेश्वर प्राण-प्रतिष्ठा एवं षोडशोपचार पूजन
सिद्ध पारद शिवलिंग की स्थापना और पूजन की एक विशिष्ट विधि है।
प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता: एक शास्त्रीय मीमांसा
पारद शिवलिंग के विषय में दो प्रकार के कथन मिलते हैं। कई ग्रंथ कहते हैं कि शुद्ध पारद शिवलिंग 'स्वयं-सिद्ध' होता है और उसे "किसी प्राणप्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं हैं"।
किंतु, तांत्रिक साधनाओं के संदर्भ में यह स्पष्ट निर्देश है कि "अशुद्ध और अचेतन पारद शिवलिंग पर किसी भी प्रकार की कोई भी साधना सफलता नहीं दे सकती है"। व्यवहार में भी, शुभ मुहूर्त देखकर शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा करवाने का विधान है।
इन दोनों कथनों का समाधान यह है कि यद्यपि एक पूर्ण-संस्कारित रसलिंग 'स्वयं-सिद्ध' होता है, तथापि विशिष्ट साधनाओं में सफलता प्राप्त करने के लिए और उसे 'जाग्रत' करने के लिए, साधक को अपने शिवलिंग को 'पशुपति मंत्रों' या 'रुद्राभिषेक मंत्रों' से विधिवत 'प्राण-प्रतिष्ठित' और 'चैतन्य' अवश्य कराना चाहिए।
स्थापना विधि
पारद शिवलिंग की स्थापना घर के पूजा-गृह में की जा सकती है। स्थापना के लिए लकड़ी की चौकी पर पीतल, तांबे या चांदी की वेदी (अर्घ्या) का प्रयोग करें। 'आगम शास्त्र' के अनुसार, शिवलिंग की वेदी (योनिका, जहाँ से अभिषेक-जल बहता है) का मुख 'उत्तर दिशा' की ओर होना चाहिए, और साधक (पूजा करने वाला) को 'पूर्व दिशा' की ओर मुख करके (शिवलिंग के पश्चिम मुख के सम्मुख) बैठना चाहिए।
तालिका 1: श्री पारदेश्वर षोडशोपचार पूजा
पारद शिवलिंग की नित्य अथवा विशेष पूजा 'षोडशोपचार' (सोलह उपचारों) विधि से की जानी चाहिए। यहाँ प्रत्येक चरण के पूर्ण संस्कृत मंत्र और संक्षिप्त विधि दी गयी है, जिनका स्रोत प्रामाणिक पूजा-विधान है:
| क्र. | उपचार | संस्कृत मंत्र (पूर्ण) | विधि एवं अर्थ | ||||||||||||||||||||||||
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| 1. | ध्यानम् |
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। |
अर्थ: "मैं उन महेश का नित्य ध्यान करता हूँ जो चांदी के पर्वत (कैलाश) के समान हैं, जिनके मस्तक पर सुन्दर चंद्रमा का मुकुट है..."। (हाथ जोड़कर पारदेश्वर महादेव का ध्यान करें)। | ||||||||||||||||||||||||
| 2. | आवाहनम् |
आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरो भव। |
अर्थ: "हे भगवान! हे देव! आइये, यहाँ इस स्थान पर स्थिर हो जाइये। जब तक मैं आपकी पूजा कर रहा हूँ, तब तक आप मेरे समक्ष रहिये।" (आवाहन मुद्रा दिखाकर पुष्प/अक्षत अर्पित करें)। | ||||||||||||||||||||||||
| 3. | पाद्यम् |
महादेव महेशान महादेव परात्पर। |
अर्थ: "हे महादेव, हे पार्वती सहित परमेश्वर! मेरे द्वारा दिए गए इस चरण-जल (पाद्य) को स्वीकार कीजिये।" (शिवलिंग के चरणों में या अर्घ्या में जल अर्पित करें)। | ||||||||||||||||||||||||
| 4. | अर्घ्यम् |
त्र्यम्बकेश सदाचार जगदादिविधायक। |
अर्थ: "हे त्रिनेत्रधारी, सदाचार के प्रवर्तक! मेरे द्वारा दिए गए इस अर्घ्य को स्वीकार करें।" (अभिषेक पात्र में जल अर्पित करें)। | ||||||||||||||||||||||||
| 5. | आचमनीयम् |
त्रिपुरान्तक दीनार्तिनाश श्रीकण्ठशाश्वत। |
अर्थ: "हे त्रिपुरान्तक! इस पवित्र आचमन-जल को ग्रहण करें।" (जल अर्पित करें)। | ||||||||||||||||||||||||
| 6. | स्नानम् | (पंचामृत स्नान हेतु गोदुग्ध, दधि, घृत, मधु, शर्करा के विशिष्ट मंत्रों का प्रयोग करें) | (पहले शुद्ध जल, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से शिवलिंग को स्नान कराएं)। | ||||||||||||||||||||||||
| 7. | वस्त्रम् | (संबंधित वैदिक मंत्र का उच्चारण करें) | (मौली धागे को वस्त्र के रूप में अर्पित करें)। | ||||||||||||||||||||||||
| 8. | गन्धः |
श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। |
अर्थ: "हे देव! यह दिव्य, सुगन्धित चन्दन का लेप स्वीकार करें।" (शिवलिंग पर चन्दन या विभूति का त्रिपुंड लगाएं)। | ||||||||||||||||||||||||
| 9. | अक्षताः |
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ शुभ्रा धूताश्च निर्मलाः। |
अर्थ: "हे परमेश्वर! मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पित इन निर्मल अक्षतों (बिना टूटे चावल) को स्वीकार करें।" (अक्षत चढ़ाएं)। | ||||||||||||||||||||||||
| 10. | पुष्पाणि |
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो। |
