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उच्छिष्ट गणपति मंत्र: वशीकरण, ऐश्वर्य और सिद्धि का उपाय !
गणपति

उच्छिष्ट गणपति मंत्र: वशीकरण, ऐश्वर्य और सिद्धि का उपाय

📿 पौराणिक•2 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 19 मई 2025
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जानिए उच्छिष्ट गणपति की गूढ़ तांत्रिक साधना, अपूर्व मंत्र, मुख जूठा होने की विशेष विधि और कैसे इस शक्तिशाली उपासना से विभीषण को मिला लंका का राज्य और कुबेर को नौ निधियां

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उच्छिष्ट गणपति मंत्र

उच्छिष्ट गणपति मंत्र

(विशिष्ट कामना पूर्ति एवं वशीकरण हेतु)

मंत्र 1 (मूल मंत्र):

ऊँ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा।

मंत्र 2 (बलि मंत्र):

गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्ट  गणेशाय महायक्षायायं बलि:।

विनियोग:

ॐ अस्य श्री उच्छिष्ट  गणपति मंत्रस्य कंकोल ऋषि:, विराट छन्द:,  श्री उच्छिष्ट गणपति देवता, मम अभीष्ट  (कामना उल्लेख)  या सर्वाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोग:।

देवता:

उच्छिष्ट गणपति (गणेश जी का एक तांत्रिक स्वरूप)।

स्रोत:

अथर्ववेद में इसका संकेत मिलता है तथा मंत्र महार्णव एवं मंत्र महोदधि जैसे तंत्र ग्रंथों में इसका विस्तृत वर्णन है।

प्रयोजन:

उच्च पद, ऐश्वर्य, वशीकरण (विशेष व्यक्ति को नाम लेकर जप करने से) , अन्न-धन वृद्धि, सर्वसिद्धि। मान्यता है कि कुबेर को नौ निधियां और विभीषण को लंका का राज्य इसी साधना से प्राप्त हुआ था।

विधि:

उच्छिष्ट गणपति की साधना की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें साधक का मुख जूठा होना चाहिए, अर्थात् साधना के समय मुख में पान, इलायची, सुपारी, गुड़ या लड्डू जैसी कोई वस्तु होनी चाहिए। कामना के अनुसार वस्तु का चयन किया जाता है (वशीकरण हेतु लौंग-इलायची, फल कामना हेतु सुपारी, धन वृद्धि हेतु गुड़, सर्वसिद्धि हेतु ताम्बुल)। साधना का प्रारंभ नित्य कर्मों से निवृत्त होकर संकल्प, विनियोग, न्यास (ऋष्यादि, कर, हृदयादि) और ध्यान से होता है। रक्तवर्ण, त्रिनेत्र, चतुर्भुज गणपति का ध्यान किया जाता है। इसके पश्चात् मूल मंत्र का जप किया जाता है। यह मंत्र सोलह हजार बार जपने से सिद्ध होता है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी से शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तक नित्य पत्नी सहित जप करने का भी विधान है।

महत्व:

यह गणपति का एक अत्यंत उग्र एवं तांत्रिक स्वरूप है, जिसकी उपासना सामान्य गणेश पूजा से सर्वथा भिन्न है। 'उच्छिष्ट' का अर्थ जूठा या अपवित्र भी होता है, जो वामाचार तांत्रिक पद्धतियों की ओर संकेत करता है। इसकी साधना अत्यंत गोपनीय और गुरुगम्य है, जिस कारण यह सर्वसाधारण में अल्पज्ञात है। यह तीव्र फलदायक किन्तु सावधानी से की जाने वाली साधना है।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

साधना परिचय

गणपति साधना क्या है?

गणपति साधना में गणेश जी को ब्रह्मांड की मूल चेतना मानकर उपासना की जाती है। गणेश के 32 रूप अलग-अलग फल देते हैं — हेरंब (संकट नाश), लक्ष्मीगणपति (धन), सिद्धिगणपति (सिद्धि)। नित्य गणपति अथर्वशीर्ष पाठ और 'ॐ गं गणपतये नमः' जप सर्वोत्तम साधना है।

साधना विधि

गणपति मंत्र जप कैसे करें?

लाल आसन पर पूर्व/उत्तर मुख करके, रुद्राक्ष माला से, गणेश ध्यान करते हुए 'ॐ गं गणपतये नमः' जपें। अनामिका और अंगूठे से माला पकड़ें। ब्रह्ममुहूर्त या बुधवार को जप विशेष फलदायी है। जप से पूर्व गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करें।

गणपति पूजन और संकल्प

रुद्राभिषेक से पहले गणेश पूजन कैसे करें?

रुद्राभिषेक से पहले: घी का दीपक जलाएं → गुरु-कुलदेवता-माता-पिता स्मरण → गणपति अथर्वशीर्ष पाठ → 'ॐ गं गणपतये नमः' और गणेश गायत्री जप → लाल चंदन, दूर्वा और मोदक अर्पित करें।

स्तोत्र विधि

गणपति अथर्वशीर्ष 21 बार पढ़ने से क्या होता है?

संकष्टी पर 21 बार=दोगुना फल, बिगड़े काम बनें। अथर्वशीर्ष: 1000 बार=सभी कामना सिद्ध। महाविघ्न/महापाप मुक्ति। दैनिक 1, बुधवार विशेष। विद्यार्थी/व्यापारी/सभी।

गणेश पूजा

गणेश जी के 32 रूपों में कौन सा रूप किस कार्य के लिए पूजें?

32 गणपति (मुद्गल पुराण)। प्रमुख: विद्या गणपति = शिक्षा। लक्ष्मी गणपति = धन। विजय गणपति = सफलता। संकटहर = संकट निवारण। शक्ति गणपति = शक्ति। हेरम्ब = भय निवारण। महागणपति = सर्वकार्य। [समीक्षा आवश्यक] — 32 नामों में ग्रंथ अनुसार भिन्नता। सामान्य: महागणपति सर्वकार्य हेतु।

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