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विस्तृत उत्तर
अग्नियों की पूजा या आराधना यज्ञों में होती है। पाठ में आदिम सप्तक का त्याग करके कुल उनचास अग्नियों का उल्लेख किया गया है और कहा गया है कि ये यज्ञों में आराधित की जाती हैं। इसलिए उनका स्थान यज्ञीय आराधना से जुड़ा हुआ है। आगे इन्हीं अग्नियों को तपस्वी, व्रतधारी, प्रजाओं के पति और रुद्रस्वरूप कहा गया है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 6, PDF पृष्ठ 34, श्लोक 3
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