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औपसर्गिक ऐश्वर्य📜 श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 55, श्लोक 42-43⏱ 1 मिनट पठन

आकाश संबंधी ऐश्वर्य क्या है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

छाया न होना, आकाशगमन, दूरश्रवण, सभी शब्दों का ज्ञान, तन्मात्रा ज्ञान और सभी प्राणियों को देखना आकाश संबंधी ऐश्वर्य है।

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विस्तृत उत्तर

आकाश संबंधी ऐश्वर्य को ऐन्द्र ऐश्वर्य भी कहा गया है। इसमें शरीर की छाया न होना, इन्द्रियों का प्रत्यक्ष दर्शन, आकाश में गमन, इन्द्रियों के अर्थ का ज्ञान, दूर से शब्द सुनने की क्षमता, सभी शब्दों के ज्ञान में पारंगत होना, तन्मात्राओं के स्वरूप का ज्ञान और सभी प्राणियों को साक्षात् देखने की सामर्थ्य शामिल है। पाठ में इन पाँच प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त साधक को कायव्यूहसामर्थ्यवान् कहा गया है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 55, श्लोक 42-43
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

आकाश संबंधी ऐश्वर्य क्या है को संदर्भ सहित समझें

आकाश संबंधी ऐश्वर्य क्या है का सबसे सीधा सार यह है: छाया न होना, आकाशगमन, दूरश्रवण, सभी शब्दों का ज्ञान, तन्मात्रा ज्ञान और सभी प्राणियों को देखना आकाश संबंधी ऐश्वर्य है।

औपसर्गिक ऐश्वर्य जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 55, श्लोक 42-43 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 55, श्लोक 42-43 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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