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विस्तृत उत्तर
अन्तःशौच वैराग्य और आत्मज्ञान से होता है। पाठ में कहा गया है कि शरीर पर श्रद्धापूर्वक वैराग्यरूपी मृत्तिका का लेपन करके और आत्मज्ञानरूपी जल में स्नान करके शुद्ध हो जाना अन्तःशौच है। यह आंतरिक शुद्धि बाहरी स्नान से श्रेष्ठ बताई गई है। शुद्ध पुरुष को ही सिद्धि मिलती है, अशुद्ध पुरुष को नहीं। इसलिए अन्तःशौच योगसाधना की वास्तविक पवित्रता है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 44, श्लोक 36
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