विस्तृत उत्तर
अश्वत्थामा की मणि निकालना केवल अपमान नहीं, बल्कि दंड का निर्णायक रूप था। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि पतित ब्राह्मण का वध न किया जाए और आततायी दंड के योग्य है; दोनों शास्त्रीय बातों का पालन करना चाहिए। अर्जुन ने कृष्ण का अभिप्राय समझ लिया। उन्होंने अश्वत्थामा के सिर की मणि बालों सहित काट ली। इससे अश्वत्थामा का तेज छिन गया। बालकों की हत्या से वह पहले ही श्रीहीन था; मणि छिनने पर उसका बाहरी प्रभाव भी समाप्त हुआ। इसके बाद उसे बंधन से मुक्त करके शिविर से बाहर निकाला गया। पाठ यह भी बताता है कि ब्राह्मणाधम के लिए सिर मूँड़ना, धन छीनना और स्थान से निकालना ही वध माना गया है, इसलिए मणि निकालना दंड और प्रतिज्ञा-पूर्ति दोनों का माध्यम बना।
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