विस्तृत उत्तर
दूतों का संदेश पाकर और गुरु वसिष्ठजी की आज्ञा से राजा दशरथ ने शुभ मुहूर्त में बारात सजाकर अयोध्या से जनकपुर की ओर प्रस्थान किया।
वसिष्ठजी ने कहा — 'सजहु बारात बजाइ निसाना' — बारात सजाओ, डंका बजवाओ। दशरथ ने तुरन्त तैयारी करवाई — हाथी, घोड़े, रथ, पालकियाँ सजाये, सेना तैयार की, ब्राह्मण-मुनि साथ लिये।
दोहा — 'चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ। भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ' — गुरुजीके वचन सुनकर 'हे नाथ! बहुत अच्छा' कहकर और सिर नवाकर तथा दूतोंको डेरा दिलवाकर राजा महलमें गये। फिर शुभ मुहूर्त में बारात चली।
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