विस्तृत उत्तर
बाहरी शुद्धि से ज्यादा आंतरिक शुद्धि जरूरी है क्योंकि पाठ में आभ्यन्तर शुचिता को श्रेष्ठ कहा गया है। बाहरी पवित्रता के साथ साधक को आंतरिक शुचिता का प्रयास करना चाहिए। शरीर पर पवित्र मिट्टी लगाकर और तीर्थजल में स्नान करके भी यदि अंतःशौच नहीं है, तो व्यक्ति मलिन रहता है। उदाहरण दिया गया है कि जल में रहने वाले जीव भी केवल जलवास से पवित्र नहीं हो जाते। सिद्धि शुद्ध पुरुष को मिलती है, अशुद्ध को नहीं।
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