विस्तृत उत्तर
नारदजी भगवान की लीला और यश को दुख-निवारण से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि भगवान के नाम और यश से युक्त वाणी लोगों के पापों का नाश करती है और साधुजन उसे सुनते-गाते हैं। व्यासजी से वे भगवान की अचिंत्य लीलाओं का स्मरण और वर्णन करने को कहते हैं, ताकि जीव बंधन से मुक्त हों। अपने अनुभव में भी वे बताते हैं कि जिन लोगों का चित्त विषयभोग की कामना से आतुर है, उनके लिए भगवान की लीला का कीर्तन संसार-सागर पार करने की नौका है। अंत में वे व्यासजी से कहते हैं कि भगवान की प्रेममयी लीला का वर्णन ही दुखों से बार-बार पीड़ित लोगों के दुख की शांति का उपाय है; अन्य उपाय वैसा नहीं है।
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