विस्तृत उत्तर
नारदजी बताते हैं कि भगवान में रुचि हो जाने पर उनकी बुद्धि भगवान में स्थिर हुई। उस बुद्धि से वे इस सत्-असत् रूप जगत को परमात्मा में माया से कल्पित देखने लगे। आगे वे कहते हैं कि संतों ने जाते समय दीनवत्सल होकर उन्हें गुप्ततम ज्ञान दिया, जिसका उपदेश स्वयं भगवान ने किया था। उसी उपदेश से वे जगत के निर्माता भगवान श्रीकृष्ण की माया के प्रभाव को समझ सके। उस माया को समझ लेने पर भगवान के परमपद की प्राप्ति होती है। इसलिए भगवान की माया को समझना केवल तर्क का विषय नहीं बताया गया; यह संतकृपा, शुद्ध चित्त, भक्ति, श्रद्धा और भगवान से प्राप्त ज्ञान के माध्यम से संभव होता है।
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