विस्तृत उत्तर
नारदजी कहते हैं कि भगवान को समर्पित कर्म संसार के तीन तापों की औषधि है। वे बताते हैं कि जो शास्त्र-विहित कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए किए जाते हैं, उन्हीं से भक्ति योग से संयुक्त ज्ञान की प्राप्ति होती है। ऐसे कर्म केवल बाहरी रीति या कर्तव्य नहीं रहते; उनका लक्ष्य भगवान का संतोष होता है। इस मार्ग पर चलने वाले लोग भगवान की आज्ञा के अनुसार कर्म करते हुए बार-बार श्रीकृष्ण के गुण और नामों का कीर्तन तथा स्मरण करते हैं। इसलिए भगवान को समर्पित कर्म वह है जिसमें कर्म, स्मरण, नाम-कीर्तन और भगवान की प्रसन्नता एक साथ जुड़े हों। ऐसा कर्म साधारण कर्म से अलग होकर आत्मशुद्धि और भक्ति का साधन बनता है।
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