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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवत 1.3, श्लोक 35-36⏱ 1 मिनट पठन

भगवान संसार रचकर भी अलग कैसे रहते हैं?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

भगवान लीला से संसार की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, पर उसमें आसक्त नहीं होते और सबके भीतर रहते हुए भी स्वतंत्र रहते हैं।

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विस्तृत उत्तर

भगवान के अकर्ता और फिर भी लीला से जगत-व्यवहार करने का रहस्य बताया गया है। वास्तव में भगवान के जन्म और कर्म प्राकृत नहीं हैं; तत्त्वज्ञानी उनके दिव्य जन्म और कर्म को वेदों का गोपनीय रहस्य मानकर वर्णन करते हैं। भगवान की लीला अमोघ है। वे लीला से संसार की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, लेकिन उसमें आसक्त नहीं होते। वे प्राणियों के अंतःकरण में छिपे रहकर ज्ञानेंद्रियों और मन के नियंता के रूप में विषयों को ग्रहण भी कराते हैं, फिर भी उनसे अलग रहते हैं। वे परम स्वतंत्र हैं और विषय उन्हें कभी लिप्त नहीं कर सकते। इसलिए भगवान जगत में कार्य करते हुए भी जगत से बंधते नहीं।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवत 1.3, श्लोक 35-36
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

भगवान संसार रचकर भी अलग कैसे रहते हैं को संदर्भ सहित समझें

भगवान संसार रचकर भी अलग कैसे रहते हैं का सबसे सीधा सार यह है: भगवान लीला से संसार की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, पर उसमें आसक्त नहीं होते और सबके भीतर रहते हुए भी स्वतंत्र रहते हैं।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवत 1.3, श्लोक 35-36 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवत 1.3, श्लोक 35-36 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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श्रीमद्भागवत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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