विस्तृत उत्तर
जब गोकर्ण ने पूछा कि धुंधुकारी को विमान मिला पर अन्य श्रोताओं को क्यों नहीं, तब भगवान के सेवकों ने श्रवण का भेद समझाया। उन्होंने कहा कि सबने समान रूप से कथा सुनी, लेकिन धुंधुकारी ने उसी तरह मनन किया। उसने सात दिन निराहार रहकर स्थिर चित्त से श्रवण किया और सुने हुए विषय पर गहरा मनन-निदिध्यासन किया। फिर वे बताते हैं कि ध्यान न देने से श्रवण निष्फल हो जाता है, संदेह मंत्र को नष्ट करता है और चंचल चित्त जप को नष्ट करता है। यथार्थ फल के लिये गुरु वचन में विश्वास, दीनता, मन के दोषों पर विजय और कथा में निश्चल मन की आवश्यकता है। इसलिए कथा सुनते समय मन स्थिर, श्रद्धापूर्ण और मननशील होना चाहिए।
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