विस्तृत उत्तर
भागवत पुराण को वेदों के सार के रूप में समझने का आधार दिया गया है। पाठ इसे वेद रूप कल्पवृक्ष का पका हुआ फल कहता है। शुकदेवजी के मुख से संबंध होने पर यह फल परमानंदमयी सुधा से परिपूर्ण हो गया है। इसमें छिलका, गुठली या त्याज्य अंश नहीं बताया गया; यह मूर्तिमान रस कहा गया है। आगे ऋषि सूतजी से कहते हैं कि शास्त्र बहुत हैं, उनमें अनेक प्रकार के कर्मों का वर्णन है और उनका एक अंश सुनना भी कठिन है। इसलिए वे सूतजी से अपनी बुद्धि से उनका सार निकालकर सुनाने को कहते हैं। इस प्रकार भागवत को वेद-वृक्ष का पका रसफल और शास्त्र-सार से जुड़ा ग्रंथ दिखाया गया है।
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