विस्तृत उत्तर
धुंधुकारी की मुक्ति में भागवत श्रवण का पूरा स्वरूप दिखाया गया है। सूर्यदेव ने श्रीमद्भागवत सप्ताह का उपाय बताया। गोकर्ण ने सात दिन कथा कही और धुंधुकारी ने निराहार रहकर स्थिर चित्त से सुना। बाद में विष्णुपार्षद बताते हैं कि कई लोगों ने कथा सुनी, पर धुंधुकारी जैसा मनन नहीं किया। उसने सुने हुए विषय का दृढ़ चित्त से मनन-निदिध्यासन किया, इसलिए फल अलग हुआ। वे यह भी बताते हैं कि अस्थिर ज्ञान व्यर्थ हो जाता है, ध्यान न देने से श्रवण नष्ट होता है, संदेह मंत्र को और चंचल चित्त जप को निष्फल करता है। गुरु वचन में विश्वास, दीनता, मन-दोषों पर विजय और कथा में एकाग्रता से श्रवण का यथार्थ फल मिलता है।
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