विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की वृद्धि का विषय शुरुआत से उठता है। शौनकजी सूतजी से पूछते हैं कि भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से प्राप्त होने वाला विवेक कैसे बढ़ता है और वैष्णव लोग माया-मोह से कैसे छूटते हैं। सूतजी उत्तर में श्रीमद्भागवत को भक्ति के प्रवाह को बढ़ाने वाला, भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने वाला और मन की शुद्धि का श्रेष्ठ साधन बताते हैं। आगे कथा में भक्ति स्वयं नारदजी से कहती है कि ज्ञान और वैराग्य उसके पुत्र हैं, पर समय के फेर से वे जर्जर हो गए हैं। नारदजी इसका कारण कलियुग बताते हैं: सदाचार, योगमार्ग और तप लुप्त हो रहे हैं, लोग शठता और कुकर्म में लग रहे हैं, और भक्ति के ग्राहकों का अभाव है। वे भक्ति को आश्वासन देते हैं कि श्रीहरि उसका कल्याण करेंगे। इसलिए स्रोत के अनुसार भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बढ़ाने की दिशा श्रीमद्भागवत के श्रवण, कृष्ण-भक्ति, मन-शुद्धि और हरि-आश्रय में है; इनके पतन का कारण कलियुग का अधर्म, लोभ और पाखंड है।
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