विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में भक्ति को रक्षा देने वाली शक्ति के रूप में बताया गया है। नारदजी पहले कहते हैं कि जिनके हृदय में प्रेमरूपिणी भक्ति रहती है, वे स्वप्न में भी यमराज को नहीं देखते। इसके बाद वे कहते हैं कि जिनके हृदय में भक्ति महारानी का निवास है, उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस या असुर भी स्पर्श करने में समर्थ नहीं होते। यह कथन किसी बाहरी उपाय की सूची नहीं देता, बल्कि हृदय में भक्ति के निवास को ही रक्षा का कारण बताता है। इसलिए स्रोत के अनुसार भूत-प्रेत बाधा से रक्षा का मूल उपाय प्रेमपूर्वक भगवान की भक्ति और हृदय में भक्ति का स्थिर निवास है।
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