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विस्तृत उत्तर
योग में चोरी न करना अस्तेय के रूप में आवश्यक बताया गया है। अस्तेय का अर्थ है कि विपत्तिकाल में भी विचारपूर्वक मन, वचन और कर्म से दूसरों का द्रव्य न लिया जाए। यह यमों में शामिल है और साधक के संयम को स्थिर करता है। पाठ में अस्तेय को संक्षेप में इसी रूप में परिभाषित किया गया है। इसलिए योगमार्ग में दूसरों की वस्तु के प्रति लोभ और अनुचित ग्रहण से बचना जरूरी है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 42, श्लोक 15
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