विस्तृत उत्तर
श्रीमद्देवीभागवत पुराण में काव्या माता की कथा देवासुर युद्ध की पृष्ठभूमि में समझाई जाती है। शुक्राचार्य असुरों के हित के लिए मृत संजीवनी विद्या पाने हेतु शिव तपस्या में गए थे। उनके अभाव में इंद्र ने असुरों पर आक्रमण किया। भयभीत असुर काव्या माता की शरण में आए। काव्या माता ने उन्हें संरक्षण दिया और देवताओं को रोकने के लिए अपने योगबल का प्रयोग किया। इस परंपरा में काव्या माता की शक्ति, शरणागत धर्म और देव-असुर संघर्ष की जटिलता पर विशेष प्रकाश पड़ता है। बाद की कथा में यही स्थिति विष्णु के सुदर्शन चक्र और भृगु श्राप तक पहुँचती है।
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