विस्तृत उत्तर
धुंधुकारी का चरित्र बहुत कठोर रूप में वर्णित है। वह जवान होने पर महाखल निकला। स्नान, शौच और ब्राह्मणोचित आचार उसमें नहीं थे। खान-पान का कोई परहेज नहीं था और क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। वह बुरी वस्तुओं का संग्रह करता था और मृतक के हाथ से छुआ अन्न भी खा लेता था। चोरी करना और सब लोगों से द्वेष रखना उसका स्वभाव बन गया। वह छिपकर दूसरों के घरों में आग लगा देता, बालकों को गोद में लेकर कुएँ में डाल देता और दीन-अंधों को तंग करता। चांडालों से उसका विशेष मेल था और वेश्याओं के कुसंग में उसने पिता की संपत्ति नष्ट कर दी।
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