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विस्तृत उत्तर
ध्यान और इन्द्रिय संयम से पाप तब दूर होते हैं जब साधक महेश्वर की शरण में जाता है। पाठ में कहा गया है कि जो लोग नियतात्मा, ध्यानपरायण और जितेन्द्रिय होकर महेश्वर के शरणागत होते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। वे शुद्धात्मा और ब्रह्मतेज से सम्पन्न होते हैं। इसलिए ध्यान, इन्द्रिय-संयम और शरणागति मिलकर पापमुक्ति का मार्ग बनते हैं।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 13, PDF पृष्ठ 66-67, श्लोक 19-21
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